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हाईकोर्ट ने एक लड़के को दोबारा इच्छा मृत्यु की अनुमति क्यों दी

 

हाल ही में भारत में इच्छा मृत्यु (Euthanasia) को लेकर एक महत्वपूर्ण मामला सामने आया, जिसमें Allahabad High Court ने एक गंभीर रूप से बीमार लड़के को दोबारा इच्छा मृत्यु की अनुमति दी। इस फैसले ने समाज में मानवता, कानून और चिकित्सा से जुड़े कई सवालों को फिर से चर्चा में ला दिया है। अदालत ने यह निर्णय लड़के की गंभीर हालत और उसके परिवार की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए लिया।
मामले के अनुसार, वह लड़का लंबे समय से एक गंभीर और लाइलाज बीमारी से पीड़ित था। डॉक्टरों के अनुसार उसकी स्थिति ऐसी थी कि उसके ठीक होने की कोई संभावना नहीं थी। वह लंबे समय से अस्पताल में भर्ती था और जीवनरक्षक उपकरणों के सहारे ही जीवित था। उसकी हालत इतनी खराब हो चुकी थी कि वह सामान्य जीवन जीने में पूरी तरह असमर्थ था और लगातार असहनीय दर्द का सामना कर रहा था।
लड़के के परिवार ने अदालत

से गुहार लगाई कि उसे इस असहनीय पीड़ा से मुक्ति दिलाई जाए। परिवार का कहना था कि उनका बेटा कई वर्षों से केवल मशीनों के सहारे जी रहा है और उसकी हालत में किसी तरह का सुधार नहीं हो रहा है। ऐसे में उसे इस दर्द से छुटकारा मिलना चाहिए। परिवार की इस भावनात्मक अपील को अदालत ने गंभीरता से लिया।
अदालत ने इस मामले में डॉक्टरों की एक विशेष टीम, यानी मेडिकल बोर्ड, से रिपोर्ट मांगी। मेडिकल बोर्ड ने जांच के बाद बताया कि मरीज की स्थिति बेहद गंभीर है और उसके ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है। डॉक्टरों ने यह भी बताया कि वह पूरी तरह जीवनरक्षक उपकरणों पर निर्भर है और उसके शरीर के कई अंग ठीक से काम नहीं कर रहे हैं।
इन सभी तथ्यों और मेडिकल रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए Allahabad High Court ने मानवीय आधार पर फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि जब किसी व्यक्ति को असहनीय और लाइलाज पीड़ा हो और उसके ठीक होने की कोई संभावना न हो, तो ऐसे मामलों में कानून और मानवता दोनों को संतुलित तरीके से देखना जरूरी है।
भारत में इच्छा मृत्यु को लेकर पहले भी कई महत्वपूर्ण फैसले दिए जा चुके हैं।pCourt of India ने 2018 में एक ऐतिहासिक निर्णय में कुछ शर्तों के साथ “Passive Euthanasia” यानी जीवनरक्षक उपकरण हटाने की अनुमति दी थी। इस फैसले के बाद ऐसे मामलों में अदालत और मेडिकल बोर्ड की अनुमति के बाद ही इच्छा मृत्यु दी जा सकती है।
इस मामले में हाईकोर्ट का फैसला केवल एक कानूनी निर्णय नहीं है, बल्कि यह मानवता और संवेदनशीलता का भी उदाहरण माना जा रहा है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि हर मामले को अलग-अलग परिस्थितियों के आधार पर ही देखा जाएगा।
अंत में यह कहा जा सकता है कि यह फैसला समाज को यह सोचने पर मजबूर करता है कि जब कोई व्यक्ति असहनीय दर्द और लाइलाज बीमारी से जूझ रहा हो, तो उसे सम्मानजनक तरीके से जीवन समाप्त करने का अधिकार मिलना चाहिए या नहीं। कानून, नैतिकता और मानवता के बीच संतुलन बनाना ऐसे मामलों में सबसे बड़ी चुनौती होती है।

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